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बृहस्पति देव – औषधीय युक्त स्नान जल
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वैदिक ज्योतिष में बृहस्पति ग्रह, जिन्हें देवगुरु, गुरु अथवा बृहस्पति देव कहा जाता है, नवग्रहों में सर्वाधिक शुभ एवं सात्त्विक ग्रह माने गए हैं। गुरु ज्ञान, धर्म, सदाचार, सत्य, आध्यात्मिकता, विद्या, संतान, विवाह, गुरु-कृपा, धन, दान, पुण्य, समृद्धि, न्याय, नीति तथा जीवन में निरंतर विकास के कारक हैं।
बृहस्पति व्यक्ति के विवेक, नैतिकता, धार्मिक आस्था, संस्कार, उच्च शिक्षा तथा आध्यात्मिक उन्नति का प्रतिनिधित्व करते हैं। जिस जातक की जन्मकुंडली में गुरु शुभ एवं बलवान हो, वह सत्यनिष्ठ, उदार, धर्मपरायण, ज्ञानवान तथा समाज में सम्मानित होता है।
गुरु धनु एवं मीन राशि के स्वामी हैं। कर्क राशि में यह उच्च तथा मकर राशि में नीच माने जाते हैं। नक्षत्रों में पुनर्वसु, विशाखा एवं पूर्वाभाद्रपद गुरु के अधीन हैं।
बृहस्पति का स्वभाव पूर्णतः सात्त्विक, शुभ, उदार एवं कल्याणकारी है। गुरु की दृष्टि जिस भाव पर पड़ती है, उस भाव की शुभता एवं शक्ति में वृद्धि होती है। इसलिए इन्हें जीवन के महान शुभकारक ग्रहों में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है।
बृहस्पति का गोचर एवं शुभ प्रभाव
वैदिक ज्योतिष के अनुसार बृहस्पति का गोचर लगभग एक वर्ष तक एक राशि में रहता है।
जन्मराशि से—
द्वितीय
पंचम
सप्तम
नवम
एकादश
भाव में गुरु का गोचर सामान्यतः अत्यंत शुभ माना जाता है।
शुभ गुरु—
धन में वृद्धि करता है।
विवाह के योग बनाता है।
संतान सुख प्रदान करता है।
शिक्षा में सफलता देता है।
धार्मिक कार्यों में रुचि बढ़ाता है।
परिवार में सुख एवं समृद्धि लाता है।
जीवन में उन्नति एवं प्रतिष्ठा प्रदान करता है।
मनुष्य जीवन पर बृहस्पति ग्रह का प्रभाव
गुरु ग्रह मनुष्य के ज्ञान, विवेक, नैतिकता, आध्यात्मिकता, धर्म, शिक्षा, संतान, विवाह, सम्मान तथा भाग्य का प्रतिनिधित्व करते हैं।
यदि गुरु शुभ एवं बलवान हो तो व्यक्ति—
सत्यवादी होता है।
धर्मपरायण होता है।
उच्च शिक्षित होता है।
दयालु एवं उदार होता है।
समाज में सम्मान प्राप्त करता है।
गुरुजनों एवं माता-पिता का आदर करता है।
धन एवं प्रतिष्ठा अर्जित करता है।
आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करता है।
यदि गुरु अशुभ अथवा पीड़ित हो तो शिक्षा, विवाह, संतान, धन एवं सम्मान में बाधाएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
शारीरिक बनावट एवं स्वभाव
यदि जन्मकुंडली के लग्न भाव में बृहस्पति स्थित हों तो जातक—
आकर्षक एवं तेजस्वी व्यक्तित्व वाला होता है।
मुखमंडल पर दिव्य आभा होती है।
व्यवहार अत्यंत विनम्र एवं मधुर होता है।
धार्मिक एवं सात्त्विक स्वभाव का होता है।
विद्वानों का सम्मान करता है।
सत्य एवं न्याय का पालन करता है।
दान-पुण्य में रुचि रखता है।
यात्राओं एवं तीर्थाटन का प्रेमी होता है।
ज्ञान प्राप्त करने के लिए सदैव उत्सुक रहता है।
ऐसे व्यक्ति सामान्यतः समाज में आदरणीय, गुरु तुल्य एवं प्रेरणास्रोत बनते हैं।
बली गुरु के प्रभाव
यदि जन्मकुंडली में गुरु शुभ एवं बलवान हो तो जातक को निम्नलिखित शुभ फल प्राप्त होते हैं—
उच्च शिक्षा
ज्ञान एवं विवेक
धार्मिक प्रवृत्ति
भाग्योदय
धन एवं समृद्धि
संतान सुख
विवाह में सफलता
सामाजिक सम्मान
आध्यात्मिक उन्नति
सत्यनिष्ठ जीवन
उत्तम स्वास्थ्य
दीर्घकालीन सफलता
गुरुजनों का आशीर्वाद
परिवार में सुख एवं शांति
बलवान गुरु व्यक्ति को जीवनभर सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं।
पीड़ित गुरु के प्रभाव
यदि गुरु राहु, केतु, शनि अथवा अन्य पाप ग्रहों से पीड़ित हो तो जातक को निम्न समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है—
शिक्षा में बाधा
विवाह में विलम्ब
संतान प्राप्ति में कठिनाई
आर्थिक अस्थिरता
गलत निर्णय
धर्म से विमुखता
गुरुजनों का अनादर
प्रतिष्ठा में कमी
नैतिक पतन
भाग्य का साथ न मिलना
पारिवारिक समस्याएँ
ऐसी स्थिति में गुरु ग्रह की शांति एवं कृपा प्राप्त करने के उपाय अत्यंत लाभकारी माने गए हैं।
बृहस्पति ग्रह से होने वाले रोग
यदि जन्मकुंडली में गुरु अशुभ अथवा पीड़ित हो तो निम्न रोग उत्पन्न हो सकते हैं—
यकृत (लीवर) संबंधी विकार
मोटापा
मधुमेह
अपच
गैस
पेट दर्द
अम्लपित्त (एसिडिटी)
पाचन तंत्र की कमजोरी
वसा संबंधी विकार
कैंसर (विशेष परिस्थितियों में)
रक्त में वसा की वृद्धि
बृहस्पति ग्रह से संबंधित कार्य एवं व्यवसाय
गुरु ग्रह निम्न व्यवसायों का प्रतिनिधित्व करते हैं—
अध्यापन
शिक्षा
प्रोफेसर
आचार्य
आध्यात्मिक गुरु
न्यायाधीश
वकील
धार्मिक प्रवचन
ज्योतिषाचार्य
लेखक
संपादक
प्रकाशन
बैंकिंग
वित्तीय सलाहकार
स्वर्ण एवं आभूषण व्यापार
धार्मिक संस्थान
सामाजिक सेवा
बृहस्पति ग्रह से संबंधित वस्तुएँ
बृहस्पति ग्रह के अधिकार क्षेत्र में आने वाली प्रमुख वस्तुएँ—
हल्दी
चना
चने की दाल
पीले वस्त्र
केसर
घी
मक्खन
मिष्ठान
केला
पीले पुष्प
पुस्तकें
धार्मिक ग्रंथ
स्वर्ण
पुखराज
बृहस्पति ग्रह से संबंधित स्थान
मंदिर
तीर्थस्थल
गुरुकुल
विद्यालय
महाविद्यालय
विश्वविद्यालय
पुस्तकालय
न्यायालय
धार्मिक संस्थाएँ
यज्ञशाला
आश्रम
संसद एवं विधानसभा
बृहस्पति ग्रह से संबंधित पशु-पक्षी
हाथी
घोड़ा
गौ
बैल
मोर
हंस
बाज
डॉल्फ़िन
व्हेल
बृहस्पति ग्रह से संबंधित वनस्पति
जड़ – केले की जड़
बृहस्पति ग्रह से संबंधित रत्न एवं पूजन सामग्री
रत्न – पीला पुखराज
उपरत्न – सुनैला (सिट्रीन)
रुद्राक्ष – पंचमुखी रुद्राक्ष
यंत्र – गुरु यंत्र
रंग – पीला एवं सुनहरा
नोट: पुखराज रत्न सदैव योग्य एवं अनुभवी ज्योतिषाचार्य की सलाह से ही धारण करना चाहिए।
बृहस्पति ग्रह के उपाय
यदि जन्मकुंडली में गुरु अशुभ अथवा दुर्बल हो तो निम्न उपाय अत्यंत शुभ एवं लाभकारी माने गए हैं—
प्रत्येक गुरुवार व्रत रखें।
भगवान विष्णु एवं देवगुरु बृहस्पति की आराधना करें।
केले के वृक्ष की पूजा करें।
पीले वस्त्र धारण करें।
हल्दी, चना दाल एवं पीले फल का दान करें।
ब्राह्मण, गुरु एवं आचार्यों का सम्मान करें।
गौ सेवा करें।
धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करें।
गुरु मंत्रों का नियमित जप करें।
योग्य ज्योतिषाचार्य की सलाह से पुखराज धारण करें।
बृहस्पति ग्रह के मंत्र
वैदिक मंत्र
ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु।
यद्दीदयच्छवस ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्॥
तांत्रिक मंत्र
ॐ बृं बृहस्पतये नमः॥
बीज मंत्र
ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः॥
धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
सनातन धर्म में बृहस्पति देवताओं के गुरु अर्थात देवगुरु बृहस्पति के रूप में पूजनीय हैं। वे महर्षि अंगिरा के पुत्र तथा समस्त देवताओं के आचार्य माने जाते हैं। वे धर्म, सत्य, ज्ञान, नीति एवं सदाचार के सर्वोच्च प्रतीक हैं।
पौराणिक मान्यता के अनुसार बृहस्पति भगवान ब्रह्मा के ज्ञान स्वरूप का भी प्रतिनिधित्व करते हैं। गुरुवार का दिन इन्हीं को समर्पित है। इस दिन भगवान विष्णु एवं बृहस्पति देव की पूजा, पीले पुष्प अर्पित करना तथा केले के वृक्ष की पूजा करना अत्यंत शुभ माना गया है।
गुरु का वर्ण पीला तथा स्वभाव पूर्णतः सात्त्विक माना गया है। वे धर्म, सदाचार एवं आध्यात्मिक ज्ञान के प्रकाश स्तम्भ हैं।
खगोल विज्ञान में बृहस्पति ग्रह का महत्व
खगोल विज्ञान के अनुसार बृहस्पति (Jupiter) सौरमंडल का सबसे विशाल ग्रह है। इसका द्रव्यमान पृथ्वी से लगभग 318 गुना अधिक है। यह मुख्यतः हाइड्रोजन एवं हीलियम गैस से निर्मित एक गैसीय महाग्रह (Gas Giant) है।
बृहस्पति का अत्यंत शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र तथा विशाल गुरुत्वाकर्षण अनेक धूमकेतुओं एवं उल्कापिंडों को अपनी ओर आकर्षित कर पृथ्वी की रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसी कारण इसे अनेक वैज्ञानिक सौरमंडल का रक्षक (Solar System’s Protector) भी कहते हैं।
इसके अनेक प्राकृतिक उपग्रह हैं, जिनमें गैनिमीड सौरमंडल का सबसे बड़ा उपग्रह है।
निष्कर्ष
वैदिक ज्योतिष में बृहस्पति ग्रह ज्ञान, धर्म, सत्य, शिक्षा, विवाह, संतान, धन, भाग्य एवं आध्यात्मिक उन्नति के सर्वोच्च कारक माने गए हैं। शुभ एवं बलवान गुरु व्यक्ति को ज्ञान, सम्मान, समृद्धि, सदाचार, उत्तम संतान, सुखी परिवार तथा आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करते हैं, जबकि अशुभ अथवा पीड़ित गुरु शिक्षा, विवाह, संतान एवं भाग्य में बाधाओं का कारण बन सकते हैं।
अतः भगवान विष्णु एवं देवगुरु बृहस्पति की आराधना, गुरुवार का व्रत, दान-पुण्य, गुरुजनों का सम्मान, सात्त्विक जीवन तथा गुरु मंत्रों का नियमित जप करने से गुरु ग्रह की कृपा प्राप्त होती है। शुभ एवं सुदृढ़ बृहस्पति जीवन में ज्ञान, धर्म, समृद्धि, प्रतिष्ठा, संतोष एवं दिव्य आशीर्वाद का संचार करते हैं।