गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर समस्त श्रद्धालुओं को हार्दिक शुभकामनाएँ।
पूज्य गुरुजी का दिव्य आशीर्वाद सदैव आप एवं आपके परिवार पर बना रहे। 🕉️🙏

॥ श्रीगुरुभ्यो नमः ॥

सनातन वैदिक संस्कृति में मनुष्य को केवल शरीर नहीं माना गया है। हमारे ऋषियों ने मनुष्य को पंचमहाभूतों से निर्मित एक दिव्य देह, प्राणमय शक्ति, मन, बुद्धि तथा आत्मा का अद्भुत समन्वय बताया है। यह सम्पूर्ण सृष्टि ब्रह्माण्डीय ऊर्जाओं से संचालित होती है तथा मनुष्य भी उन्हीं दिव्य ऊर्जाओं का एक सूक्ष्म स्वरूप है।

 

जिस प्रकार सूर्य एवं चन्द्रमा सम्पूर्ण सौरमण्डल को प्रकाशित करते है, उसी प्रकार नवग्रह मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र पर अपना सूक्ष्म प्रभाव स्थापित करते हैं। मनुष्य का जन्म, उसका स्वभाव, विचार, कर्म, स्वास्थ्य, विवाह, संतान, व्यवसाय, धन, मान-सम्मान, रोग, आयु, भाग्य तथा आध्यात्मिक उन्नति—इन सभी का सम्बन्ध किसी न किसी रूप में नवग्रहों से माना गया है।

 

यही कारण है कि वैदिक ज्योतिष को केवल भविष्य बताने का विज्ञान नहीं, अपितु कर्म, भाग्य और ब्रह्माण्डीय ऊर्जा के मध्य सम्बन्ध स्थापित करने वाला दिव्य ज्योतिष शास्त्र कहा गया है।

 

 

ग्रहों का प्रभाव

 

प्रत्येक मनुष्य जब जन्म लेता है, उसी क्षण आकाशमण्डल में स्थित ग्रहों की जो स्थिति होती है, वही उसकी जन्मकुण्डली का आधार बनती है।

 

जन्मकुण्डली में स्थित —

 

– ग्रहों की स्थिति

– ग्रहों की दृष्टियाँ

– ग्रहों का बल

– उच्च एवं नीच राशि

– मित्र एवं शत्रु ग्रह

– महादशा

– अन्तर्दशा

– प्रत्यन्तर दशा

– सूक्ष्म दशा

– गोचर

 

इन सभी का संयुक्त प्रभाव व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन पर पड़ता है।

 

जब ग्रह शुभ होते हैं तब—

 

– धन की वृद्धि होती है।

– रोगों से रक्षा होती है।

– यश एवं प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।

– उत्तम संतान की प्राप्ति होती है।

– व्यवसाय उन्नति करता है।

– मानसिक शान्ति प्राप्त होती है।

– आध्यात्मिक प्रगति होती है।

– परिवार में सुख एवं सौहार्द बना रहता है।

– लगभग सम्पूर्ण प्रकार के लाभ भोगना सुनिश्चित हैं 

 

किन्तु जब यही ग्रह अशुभ स्थिति में होते हैं, तब जीवन में अनेक प्रकार के विघ्न उत्पन्न होने लगते हैं।

 

 

अशुभ ग्रहों के संकेत

 

यदि किसी जातक के ग्रह प्रतिकूल हों तो उसके जीवन में कुछ नकारात्मक परिस्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं—

 

* परिश्रम करने पर भी सफलता प्राप्त न होना।

* बार-बार बनते हुए कार्यों का रुक जाना।

* बिना कारण आर्थिक हानि होना।

* व्यापार में निरन्तर अवरोध उत्पन्न होना।

* नौकरी में अस्थिरता।

* विवाह में विलम्ब।

* दाम्पत्य जीवन में तनाव।

* संतान प्राप्ति में बाधा।

* न्यायालय, शत्रु अथवा ऋण सम्बन्धी समस्याएँ।

* निरन्तर रोग एवं मानसिक तनाव।

* भय, अवसाद तथा नकारात्मक विचारों का बढ़ना।

* घर में कलह एवं अशान्ति।

* बिना कारण क्रोध, आलस्य अथवा भ्रम की स्थिति।

* पूजा-पाठ में मन न लगना।

* निर्णय क्षमता का क्षीण होना।

* परिवार एवं मित्रों द्वारा विश्वासघात।

* भाग्य का साथ न देना।



ऐसी नकारात्मक  परिस्थितियों में मनुष्य अनेक प्रकार के उपाय करता है, किन्तु अपेक्षित फल प्राप्त नहीं हो पाता।

 




ऋषियों की अद्भुत खोज

 

हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों ने हजारों वर्षों तक हिमालय, वनों तथा तपोभूमियों में तपस्या करके प्रकृति के सूक्ष्म रहस्यों का अध्ययन किया।

 

उन्होंने अनुभव किया कि प्रत्येक ग्रह का सम्बन्ध विशेष प्रकार की—

 

– वनस्पतियों, मूलों, पत्रों, पुष्पों, बीजों, सुगन्धित द्रव्यों, वृक्षों, औषधियों

 

से होता है।

 

उन्होंने इन दिव्य औषधियों का प्रयोग केवल चिकित्सा के लिए ही नहीं, अपितु ग्रहशान्ति एवं आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी किया।

 

इसी ज्ञान के आधार पर औषधियुक्त स्नान जल की परम्परा का जन्म हुआ।

 

 

औषधियुक्त स्नान जल का रहस्य

 

वैदिक परम्परा में स्नान केवल शरीर की धूल हटाने का साधन नहीं है।

 

स्नान का वास्तविक उद्देश्य है—

 

– देह की शुद्धि

– प्राणों की शुद्धि

– मन की शुद्धि

– आभामण्डल की शुद्धि

– नकारात्मक ऊर्जा का क्षय

– सात्त्विकता की वृद्धि

– ग्रहों की अनुकूलता का आह्वान

– नवग्रहों के शुभ फल को जागृत करना।

 

जब पवित्र गंगाजल में ग्रहानुकूल औषधियों का समुचित मिश्रण कर वैदिक विधि से अभिमन्त्रित करके जन कल्याण हेतु तैयार किया जाता हैं, तब वह स्नान जल केवल जल नहीं रह जाता, बल्कि एक दिव्य नवग्रह आध्यात्मिक जल में परिवर्तित हो जाता है। 

 

ऐसा स्नान जल व्यक्ति के भीतर सात्त्विकता, आत्मविश्वास, मानसिक प्रसन्नता तथा आध्यात्मिक चेतना का संचार करने का माध्यम माना गया है।

 

 

आधुनिक युग की आवश्यकता

 

आज का मनुष्य अत्यन्त व्यस्त जीवन व्यतीत कर रहा है।

 

समयाभाव, मानसिक तनाव, प्रतियोगिता, आर्थिक दबाव तथा असंतुलित जीवनशैली के कारण अधिकांश लोग विस्तृत पूजा, यज्ञ, जप, अनुष्ठान अथवा दीर्घकालीन ग्रहशान्ति उपाय नियमित रूप से नहीं कर पाते।

 

रत्न धारण करना प्रत्येक व्यक्ति की आर्थिक क्षमता में सम्भव नहीं।

 

विशाल यज्ञ सम्पन्न कराना सभी के लिए सहज नहीं।

 

दान-विधान का शास्त्रीय ज्ञान भी प्रत्येक व्यक्ति को उपलब्ध नहीं।

 

ऐसी स्थिति में यदि कोई ऐसा वैदिक उपाय उपलब्ध हो जो—

 

– सरल हो,

– सहज हो,

– अल्प समय में सम्पन्न हो,

– प्रत्येक व्यक्ति कर सके,

– दैनिक जीवन का अंग बन सके,

 

तो निःसन्देह वह लोककल्याणकारी सिद्ध होगा।

 

 

गुरु संकल्प

 

परम पूज्य तपस्वी गुरुजी का दिव्य संकल्प है—

 

“भारत देश का प्रत्येक परिवार प्रतिदिन ऐसा स्नान करे जो केवल शरीर की स्वच्छता का माध्यम न होकर, नवग्रहों की कृपा, मानसिक शान्ति, सात्त्विक ऊर्जा, आध्यात्मिक उन्नति तथा जीवन में शुभता का आधार बने।”

 

इसी जनकल्याणकारी संकल्प की पूर्ति हेतु माँ भागीरथी गंगा के पावन जल, हिमालय एवं देवभूमि की दुर्लभ औषधियां, नवग्रहों से सम्बन्धित दिव्य द्रव्यों तथा वैदिक मन्त्रों से अभिमन्त्रित तत्वों के समन्वय से “नवग्रह औषधियुक्त स्नान जल” का निर्माण किया गया है।

 

यह केवल एक उत्पाद नहीं, अपितु सनातन वैदिक परम्परा, ऋषि-परम्परा एवं भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान का एक विनम्र पुनर्जागरण है।

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