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शनि-देव – औषधीय युक्त स्नान जल
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वैदिक ज्योतिष में शनि ग्रह को न्याय, कर्मफल, अनुशासन, धैर्य, आयु, श्रम, सेवा, तप, त्याग एवं आध्यात्मिक परिपक्वता का कारक ग्रह माना गया है। नवग्रहों में शनि को कर्मफलदाता तथा न्यायाधीश का पद प्राप्त है। शनि मनुष्य को उसके कर्मों के अनुसार शुभ अथवा अशुभ फल प्रदान करते हैं। इसलिए इन्हें कर्म के देवता भी कहा जाता है।
शनि ग्रह मकर एवं कुंभ राशि के स्वामी हैं। तुला राशि में यह उच्च तथा मेष राशि में नीच माने जाते हैं। नक्षत्रों में पुष्य, अनुराधा एवं उत्तराभाद्रपद शनि के अधीन हैं।
शनि नवग्रहों में सबसे मंद गति से भ्रमण करने वाले ग्रह हैं। यह एक राशि में लगभग ढाई वर्ष तक रहते हैं। इसी कारण शनि का गोचर मनुष्य के जीवन पर दीर्घकालिक प्रभाव डालता है। जब शनि जन्म राशि से बारहवें, प्रथम एवं द्वितीय भाव में भ्रमण करते हैं, तब लगभग साढ़े सात वर्ष का काल बनता है, जिसे शनि की साढ़ेसाती कहा जाता है। इसी प्रकार चतुर्थ एवं अष्टम भाव में ढाई-ढाई वर्ष का गोचर शनि ढैय्या कहलाता है।
सामान्य जनमानस में शनि को लेकर अनेक भ्रांतियाँ प्रचलित हैं। बहुत से लोग शनि का नाम सुनते ही भयभीत हो जाते हैं, जबकि शास्त्रों में शनि को अन्यायी नहीं, बल्कि निष्पक्ष न्यायाधीश कहा गया है। शनि कभी भी बिना कारण कष्ट नहीं देते। वे केवल मनुष्य को उसके कर्मों का फल प्रदान करते हैं। यदि जन्मकुंडली में शनि शुभ एवं बलवान हों, तो वे निर्धन व्यक्ति को भी उच्च पद, सम्मान, धन एवं प्रतिष्ठा प्रदान कर सकते हैं।
मनुष्य जीवन पर शनि ग्रह का प्रभाव
शनि ग्रह मनुष्य के कर्म, धैर्य, संघर्ष, अनुशासन, सहनशीलता, परिश्रम तथा जीवन की स्थिरता को नियंत्रित करते हैं। यह ग्रह व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों से संघर्ष करना सिखाता है तथा अनुभव के माध्यम से जीवन का वास्तविक ज्ञान प्रदान करता है।
यदि शनि शुभ हो तो व्यक्ति—
परिश्रमी होता है।
अनुशासित जीवन जीता है।
न्यायप्रिय होता है।
धैर्यवान रहता है।
कठिन परिस्थितियों में भी दृढ़ रहता है।
दीर्घकालिक सफलता प्राप्त करता है।
समाज में सम्मानित होता है।
यदि शनि अशुभ अथवा पीड़ित हो तो व्यक्ति—
अनावश्यक संघर्ष करता है।
कार्यों में विलम्ब का सामना करता है।
मानसिक तनाव से ग्रस्त रहता है।
आर्थिक कठिनाइयों का अनुभव करता है।
न्यायालय, ऋण अथवा दंड जैसी परिस्थितियों का सामना कर सकता है।
शारीरिक बनावट एवं स्वभाव
यदि जन्मकुंडली के लग्न भाव में शनि स्थित हो तो जातक सामान्यतः—
दुबले-पतले अथवा लंबे कद का होता है।
वर्ण श्याम अथवा सांवला हो सकता है।
बाल रूखे एवं शुष्क होते हैं।
स्वभाव गंभीर एवं शांत होता है।
एकांतप्रिय होता है।
कम बोलता है।
धैर्यपूर्वक कार्य करता है।
जीवन में सफलता देर से प्राप्त करता है।
यदि शनि शुभ हो तो ऐसा व्यक्ति अत्यंत गुणवान, न्यायप्रिय एवं कर्मनिष्ठ होता है।
बली शनि के प्रभाव
यदि जन्मकुंडली में शनि शुभ एवं बलवान हो तो जातक को निम्नलिखित शुभ फल प्राप्त होते हैं—
धैर्य एवं संयम
कर्मठता
अनुशासन
न्यायप्रियता
प्रशासनिक क्षमता
दीर्घायु
स्थायी धन
उद्योग एवं व्यवसाय में सफलता
कठिन परिश्रम का उचित फल
समाज में प्रतिष्ठा
नेतृत्व क्षमता
आध्यात्मिक परिपक्वता
विपरीत परिस्थितियों में सफलता
बलवान शनि व्यक्ति को धीरे-धीरे किन्तु स्थायी सफलता प्रदान करते हैं।
पीड़ित शनि के प्रभाव
यदि शनि राहु, केतु, मंगल अथवा अन्य पाप ग्रहों से पीड़ित हो तो जातक को निम्न समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है—
कार्यों में अत्यधिक विलम्ब
आर्थिक संकट
न्यायालय संबंधी विवाद
कारावास की संभावना
दुर्घटना
शत्रु बाधा
मानसिक तनाव
अवसाद
बेरोजगारी
परिवार से दूरी
निराशा
अत्यधिक संघर्ष
पीड़ित शनि व्यक्ति के जीवन में कठिन परिस्थितियाँ उत्पन्न करते हैं, जिनका उद्देश्य उसे कर्म, धैर्य एवं आत्मसंयम का पाठ पढ़ाना माना जाता है।
शनि ग्रह से होने वाले रोग
यदि जन्मकुंडली में शनि अशुभ अथवा पीड़ित हो तो निम्न रोग उत्पन्न हो सकते हैं—
गठिया
जोड़ों का दर्द
लकवा (पक्षाघात)
अस्थमा
कैंसर
त्वचा रोग
नसों के रोग
हड्डियों की कमजोरी
फ्रैक्चर
वात रोग
श्वास संबंधी रोग
दीर्घकालिक रोग
शनि ग्रह से संबंधित कार्य एवं व्यवसाय
शनि ग्रह निम्न व्यवसायों का प्रतिनिधित्व करते हैं—
लोहा एवं इस्पात उद्योग
मशीन निर्माण
ऑटोमोबाइल उद्योग
इंजीनियरिंग
खनन उद्योग
पेट्रोलियम उद्योग
कोयला उद्योग
रसायन उद्योग
कृषि उपकरण निर्माण
श्रम आधारित उद्योग
कारखाने
न्याय विभाग
जेल प्रशासन
परिवहन
निर्माण कार्य
शनि ग्रह से संबंधित वस्तुएँ
शनि ग्रह के अधिकार क्षेत्र में आने वाली प्रमुख वस्तुएँ—
लोहा
इस्पात
मशीनें
चमड़ा
लकड़ी
कोयला
पेट्रोलियम
रसायन
सरसों का तेल
काली उड़द
तिल
काली वस्तुएँ
प्राचीन धातुएँ
शनि ग्रह से संबंधित स्थान
कारखाने
लौह उद्योग
कोयला खदान
पर्वतीय क्षेत्र
जंगल
गुफाएँ
पुराने भवन
खंडहर
जेल
न्यायालय
मंदिर
कुएँ
श्रमिक बस्तियाँ
औद्योगिक क्षेत्र
शनि ग्रह से संबंधित पशु-पक्षी
कौआ
गिद्ध
भैंस
गधा
ऊँट
भालू
भेड़िया
मगरमच्छ
साँप
बिल्ली
चमगादड़
उल्लू
शनि ग्रह से संबंधित वनस्पति
जड़ – धतूरे की जड़
शनि ग्रह से संबंधित रत्न एवं पूजन सामग्री
रत्न – नीलम
उपरत्न – नीली
रुद्राक्ष – सप्तमुखी रुद्राक्ष
यंत्र – शनि यंत्र
रंग – काला, गहरा नीला एवं श्याम
नोट: नीलम रत्न सदैव योग्य ज्योतिषाचार्य की सलाह से ही धारण करना चाहिए।
शनि ग्रह के उपाय
यदि जन्मकुंडली में शनि अशुभ अथवा पीड़ित हो तो निम्न उपाय अत्यंत लाभकारी माने गए हैं—
प्रत्येक शनिवार व्रत रखें।
शनि देव की उपासना करें।
पीपल वृक्ष की पूजा करें।
सरसों के तेल का दीपक जलाएँ।
काले तिल एवं सरसों के तेल का दान करें।
कौओं एवं काले कुत्तों को भोजन कराएँ।
श्रमिकों एवं निर्धनों की सेवा करें।
हनुमान चालीसा एवं सुंदरकाण्ड का पाठ करें।
शनि मंत्रों का नियमित जप करें।
योग्य ज्योतिषाचार्य की सलाह से नीलम धारण करें।
शनि ग्रह के मंत्र
वैदिक मंत्र
ॐ शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये।
शं योरभि स्त्रवन्तु नः॥
तांत्रिक मंत्र
ॐ शं शनैश्चराय नमः॥
बीज मंत्र
ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः॥
धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
सनातन धर्म में शनि ग्रह की पूजा भगवान शनिदेव के रूप में की जाती है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार शनिदेव सूर्यदेव एवं माता छाया (संवर्णा) के पुत्र हैं। उनका वर्ण श्याम है और वे न्याय एवं कर्मफल के अधिष्ठाता देव माने जाते हैं।
शनिदेव का वाहन विभिन्न ग्रंथों में कौआ, गिद्ध अथवा गर्दभ (गधा) बताया गया है। वे दंडाधिकारी देवता हैं, जो मनुष्य के शुभ एवं अशुभ कर्मों के अनुसार फल प्रदान करते हैं। इसलिए उन्हें निष्पक्ष न्यायाधीश कहा गया है।
शनिवार का दिन शनिदेव की उपासना के लिए विशेष शुभ माना जाता है। इस दिन शनि मंदिर में तिल के तेल का दीपक जलाना, काले तिल, उड़द एवं सरसों का तेल अर्पित करना तथा हनुमानजी की आराधना करना विशेष फलदायी माना गया है।
खगोल विज्ञान में शनि ग्रह का महत्व
खगोल विज्ञान के अनुसार शनि सौरमंडल का छठा ग्रह तथा बृहस्पति के बाद दूसरा सबसे बड़ा ग्रह है। इसकी सबसे प्रमुख विशेषता इसके चारों ओर स्थित विशाल वलय (Rings) हैं, जो इसे अन्य ग्रहों से अलग पहचान प्रदान करते हैं।
शनि मुख्यतः हाइड्रोजन एवं हीलियम गैसों से निर्मित एक गैसीय महाग्रह है। इसके अनेक प्राकृतिक उपग्रह हैं, जिनमें टाइटन सबसे बड़ा उपग्रह माना जाता है।
निष्कर्ष
वैदिक ज्योतिष में शनि ग्रह को केवल कष्ट देने वाला ग्रह मानना उचित नहीं है। वास्तव में शनिदेव कर्म, न्याय, अनुशासन, धैर्य एवं जीवन के वास्तविक अनुभवों के प्रतीक हैं। शुभ एवं बलवान शनि व्यक्ति को उच्च पद, दीर्घायु, स्थायी सफलता, सम्मान एवं समृद्धि प्रदान करते हैं, जबकि अशुभ अथवा पीड़ित शनि मनुष्य को उसके कर्मों के अनुसार कठिन अनुभवों से सीखने का अवसर देते हैं।
अतः शनिदेव की उपासना, सत्यनिष्ठ जीवन, श्रम, सेवा, दान-पुण्य, हनुमानजी की आराधना तथा शनि मंत्रों का नियमित जप करने से शनिदेव की कृपा प्राप्त होती है। शुभ एवं सुदृढ़ शनि जीवन में धैर्य, न्याय, स्थिरता, दीर्घायु, सफलता तथा आध्यात्मिक परिपक्वता का मार्ग प्रशस्त करते हैं।